Will Hun Mante also become a dictator like his father Hun Sen?
क्या हुन मनते भी पिता हुन सेन कि तरह तानाशाह बनेंगे ?
क्या हुन मनते भी पिता हुन सेन कि तरह तानाशाह बनेंगे ?
साउथ चाइना सी के पास दक्षिण पूर्वी एशिया में कंबोडिया देश आया है । लाओस वियतनाम और थाईलैंड के पड़ोसी कंबोडिया पर 38 बरस तक एकछत्र राज करने के बाद प्रधानमंत्री हुन सेन ने अपने पुत्र हुन मनते के लिए कुर्सी खाली करने का ऐलान किया है । मनेत कंबोडिया की थल सेना के मुखिया है । 22 अगस्त को वह प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंने वाले है । उससे पहले ही उनकी तुलना नोर्थ कोरिया और सीरिया के के तानाशाह किम जोंग उन और बशर अल असद से होने लगी है । कथित लोकतांत्रिक देश में इसे नेक्स्ट जनरेशन डायनेस्ट यानी अगली पीढ़ी का राजा बताया जा रहा है । और कहाँ जा रहा है कि सिर्फ लिबास बदलनेवाला है । और आत्मा वहीं रेहनेवाली है ।
कंबोडिया में भारत के लोग टूरिस्ट के तौर पर खूब जाते हैं। वहाँ अंगकोरवाट का मंदिर है और भी टूरिस्ट स्पॉट है । इस कारण से भी हमारी इसमें दिलचस्पी होनी चाहिए कंबोडिया, वियतनाम, थाईलैंड के पूर्व में भारत की तरफ से टूरिस्ट का प्रभाव बढ़ा है ।
26 जुलाई कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन सेन ने जब एलान किया कि अगले चार हफ्ते में हुन मनेत कंबोडिया के प्रधानमंत्री होंगे । तब बहुत कम लोगों को हैरानी हुई । बहोत समय पहले ही इसका संकेत उन्होंने दे दिया था । उनका स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था । और वो अपने बेटे के लिए सुरक्षित रास्ता तैयार कर रहे थे । इसी के चलते चुनाव का इंतझार भी हो रहा था । 25 जून को हुए चुनाव में हुन सेन कि कंबोडियन पीपल्स पार्टी सीसीपी को 125 में से 120 सीटे मीली इसके तुरंत बाद उन्होंने अपना फैसला सुनाया था । फैसला बहोत पहले से तय था ।
भारत के पूर्व में म्यांमार और थाईलैंड के बाद कंबोडिया है । इसके उत्तर में लाओत्से और पूर्व में वियतनाम के बाद दक्षिणी चीन सागर शुरु होता है । इस का आधिकारीक नाम किंगडम ऑफ कंबोडिया है । इस कि राजधानी का नाम नोम पेन्ह है। इस देश की आबादी डेढ़ करोड़ के आसपास है । और 97 % लोग उसमें बौद्ध धर्म को मानने वाले हैं । 2% मुस्लिम है और 1% में बाकी सब धर्म आते हैं । यहां पर संवैधानिक राजशाही है । राजा भी है, और चुनी हुई सरकार भी है । संसद में दो सदन है । जो नेशनल असेंबली केहलाता है । सेनेट में 62 मेंबर्स होते है । 24 प्रान्तों से 58 मेम्बर्स चुनकर आते है । दो को राजा और दो को नेशनल एसेम्बली की तरफ से मनोनीत किया जाता है । नेशनल एसेम्बली का चुनाव जनता के डायरेक्ट वोट से 125 सांसद बनते हैं । सरकार बनाने की स्थिति में आप को बहुमत के लिए 63 से ज्यादा सीटें चाहिए। और बहुमत के दलवाले नेता को प्रधानमंत्री बनाया जाता है ।
ज्यादातर एशियाई और अफ्रीकी देश यूरोपीय देशों के मध्य काल से गुलाम रहे है । कंबोडिया का भी यही हाल था । कम्बोडिया फ्रांस की कोलोनी था । और 1953 में ये फ़्रांस से आजाद हुआ । तब तत्कालीन राजा नॉर्दम सिहानौक ने लोकतंत्र लाने का वादा किया, और चुनाव कराने का ऐलान किया । और अपनी गद्दी भी छोड दी । खुद नेता बन गये । और राजा कि गद्दी पर अपने बुजुर्ग पिता नॉर्दम सुरा मृत को बैठा दिया । फुन सिन पेक नाम की अपनी पार्टी बनाई ।जिसका अर्थ होता है लोकप्रिय । वह चुनाव में सब सीटों पर जीत गये । और सिहानौक पहले प्रधानमंत्री बन गये । वो फ़िल्म बनाने यूरोप गये । और उनके रक्षा मंत्री लोन नोल ने तख्तापलट कर दिया और सत्ता में आने के बाद वह अमेरिका के इशारों पे राज चलाने लगे । उसने अमेरिका को खुली छूट दे दी । अमेरिका उस समय वियेतनाम में जंग लड़ रहा था । हो ची मीन्ह वहाँ पर प्रतिरोध के नेता थे । जंगलों से होकर गुजरने वाली एक सप्लाई लाइन थी । इसको हो ची मीन्ह ट्रेल कहाँ जाता था । जिसके जरिए वियतनाम के लड़ाकों को अमेरिका के खिलाफ अपने रसद गोला, बारूद और खाद्यान्न मीलते थे । इसके जरिए नोर्थ वियतनाम के गोरिल्ला सैनिक अपनी लडाई जारी रख पाते थे । हो ची मीन्ह ट्रेल का एक बड़ा हिस्सा कंबोडिया से होकर जाता था । जब लोन नोल वहां पर राज्य अध्यक्ष बन गये तो उसने अमेरिका को एक्सेस दे दिया और तब उसने हो ची मीन्ह ट्रेल पर भारी बमबारी कि इस से कंबोडिया के लोग नाराज हुए । और वे खमेर रूग के साथ जुड़ने लगे । यह कंबोडिया का एक कम्युनिस्ट गुरिल्ला संगठन था । और जहां अमरीका जाएगा वहां रशिया कि एंट्री होगी । जैसे अमेरिका गया वैसे ही तुरंत रशिया एक्टिव हो गया और उसने खमेर रूग के ऊपर अपना हाथ रख दिया और जनता जब नाराज हुई तो वह खमेर रूग की तरफ मुडने लगी । खमेर रूग के नेता का नाम पोल पोट था । अपने गोरिल्ला सैनिकों के दम पर पोल पोट अप्रैल 1975 में राजधानी नोम पेन पर कब्जा करने में सफल होता है । लोन नोल भाग गया और खमेर रूग का शासन जनवरी 1979 तक चलता रहा । लेकिन साडे 4 साल में कंबोडिया में पच्चीस लाख लोगों का नरसंहार हुआ । हुन सेन उसी खमेर रूग का कमांडर हुआ करता था । 1977 में उनकी पोल पॉट से खटपट हो गई । फिर वह वियेतनाम भाग गया । इस बीच में खमेर रूग ने वियतनाम के इलाकों पर हमला शुरू कर दिया । वियेतनाम ने अपनी नौसेना के साथ कंबोडिया पर हमला कर दिया । हुन सेन वियतनाम सेना के साथ आया । और दो हफ्ते में खमेर रूग को खदेड़ दिया । इसके बाद कंबोडिया में कटपुतली सरकार बनी उस सरकार में हुन सेन को विदेश मंत्री बना दिया गया। और 1985 में वो प्रधानमंत्री भी बन गया । वियतनाम दस साल तक कम्बोडिया में रहा । कंबोडिया में नुकसान की वजह से वियतनाम को कंबोडिया से बाहर निकलना पड़ा । क्योंकि वह दूसरे देश में दूसरी किसी की प्रांतीयताओं में जातियताओ में उलझना नहीं चाहता था ।
1989 में वियतनाम कंबोडिया से निकला और इस उपलक्ष में पेरिस में शांति समझौता हुआ । तब युएन ने चुनाव कराने की जवाबदारी अपने हाथ में ली । यूएन के संरक्षण और निगरानी वाली नई व्यवस्था के तहत 1993 के साल मे कंबोडिया का पहला चुनाव हुआ। लोग कहते हैं कि एक लोता चुनाव हुआ था । और नतीजे में किसी को बहुमत नहीं मिला था । सबसे ज्यादा सीटें मिली थी। राजा सिहानौक कि बनायी फुन सिन पेक नाम की पार्टी को । राजा सिहानौक ने 1981 तक सरकार चलायी और 1993 में इसकी कमान उनके बेटे राजकुमार रणरिध के पास थी । दूसरे नंबर पर पार्टी थी हुन सेन कि सीपीपी कंबोडिया पीपुल्स पार्टी दूसरे नंबर की पार्टी ने यह नतीजे मानने से इनकार कर दिया और हिंसा की धमकी दी । पर देश अभी-अभी युद्ध की छाया से बाहर निकला था । तब राजा सिहानौक ने अपने राजकुमार बेटे रणरिध और पूर्व प्रधानमंत्री हुन सेन के बीच समझौता करवाया । और दो दो प्रधानमंत्री हो गये । 5 साल तक यह व्यवस्था चली । 1998 में दूसरा चुनाव होने तक हुन सेन ने रणरिध से अपनी युक्तियों के जरिए मुक्ति पा ली थी । कंबोडिया की पॉलिटिक्स में अब उनकी प्रासंगिकता नहीं थी । जब 1998 में दूसरा चुनाव हुआ । तो हुन सेन कि सीपीपी
पार्टी को 64 से ज्यादा सीटें मिली यानी स्पष्ट बहुमत मिली । 2003 में तीसरा चुनाव आता है । इस बार सीपीपी को मिलती है 73 सीट । 2008 में चौथा चुनाव उसमें 90 सीटें मीलती है । 2013 में पांचवे चुनाव में 68 सीट मिलती है ।और दूसरे नंबर पर चल रही थी । सीएनआरपी उसके खाते में 55 सीटें आई थी । पहली बार किसी ने इस तरह की चुनौती पेश की थी । सेम रेनसी सीएनआरपी के नेता थे। उनका फेन सपोर्ट बढ रहा था । यहां पर तानाशाह अपनी आंखरी चाल चलता है । की विपक्ष को मैदान से ही हटा दो । सीएनआरपी पार्टी अमेरिका के साथ मिलकर सरकार का तख्तापलट करना चाहती है । ऐसा इल्जाम लगाकर 2013 के चुनाव के बाद उन पर मुकदमे हुए । 2015 में वो फ्रांस चले गये । और 2017 में कोर्ट ने सीएनआरपी पार्टी को भंग कर दिया । छठवा चुनाव 2018 में होता है । अब चुनौती देने वाला कोई नहीं है । और सीपीपी को मीलती है 125 में से 125 सीटे । 2023 के चुनाव से पहले एक नया विपक्ष तैयार करने की कोशिश होती है । सीएनआरपी के नेता फिर से इकठ्ठा हुए थे । और केंडल लाइट पार्टी जॉइंट कर ली थी । लेकिन चुनाव आयोग ने पार्टी के पास पर्याप्त दस्तावेज नहीं है । यह केहकर रजिस्ट्रेशन करने से ही इनकार कर दिया । चुनाव से पहले स्वतंत्र अखबार वॉइस ऑफ डेमोक्रेसी को भी बंद करवा दिया गया। चुनाव के नतीजो में 125 में से 120 सीटे मिली ।
अब हुन सेन को चुनौती देने वाला कोई बचा नहीं था । इस लिए वह वफादार और काबिल उतराधिकारी के लिए गद्दी छोड रहे है । फिलहाल राजनीति नहीं छोड़ेगे, पार्टी की कमान अपने हाथ में रखेगे । हुन मनेत 45 साल के है । मिलेट्री स्कूल से पढाई की है । इस लिए इन्हें शांत और काबिल बताकर पेश किया जाता है । हुन मनेत के जरिए हुन सेन बदलाव और सुधार का झुनझुना जनता को सौंपना चाहते है । तानाशाह आम जनता के नहीं अपने मालिको और अपने लोगों की उम्मीदों पर क्रूरता के सहारे खरे, उतरते हैं ।
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Writer Ridham Kumar
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