Value-Based Yoga Education in Higher Education Sector
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उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मूल्य परक योग शिक्षा
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उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मूल्य परक योग शिक्षा
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मूल्य परक योग शिक्षा
शिक्षा आज लगभग सभी वर्गों एवं आयु के लिये सुलभ हो गई है । यदि हम अपने आस-पास भी देखें तो पाएंगे कि हर बच्चा किसी ना किसी प्रकार से शिक्षार्जन में व्यस्त है । वास्तव में शिक्षा हम सभी के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है । शिक्षा से ही राष्ट्र को कलाम और किरण बेदी मिलते हैं । शिक्षा से ही बच्चों में से उनकी सृजनात्मक क्षमता को बाहर ला सकती है । स्वामी विवेकानंद नें कहा है कि शिक्षा मानव में निहित दैवीय पूर्णता की अभिव्यक्ति है ।
प्राचीन भारतीय परंपरा कहती है कि हम सभी के व्यक्तित्व में असीम उर्जा और मूल्यों को विकसित एवं अभिव्यक्त करने की क्षमता विद्यमान है । आदि शंकराचार्य के अनुसार शिक्षा आत्मानुभूति के लिये है ।आवश्यकता है तो केवल इसे सतह पर लाकर सही दिशा देने की । आज की शिक्षा पध्दति हमें किताबें पढाकर डिग्रीधारी तो बना रही है पर इसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिससे इन मूल्यों को विकसित कर व्यवहारिक जीवन के अनुरूप ढाला जा सके ।
आज की प्रचलित शिक्षा प्रणाली की सबसे बडी कमी यह है कि यह छात्रों का बौध्दिक विकास तो कर रही है पर इसमें मानसिक, भावनात्मक एवं नैतिक विकास के लिये किसी भी प्रकार की कोई व्यवस्था या योजना नहीं है । जबकि यह सर्व विदित तथ्य है कि सर्वांगीण विकास के लिये व्यक्तित्व के इन आयामों का संतुलित विकास भी आवश्यक है । महात्मा गांधी ने कहा है कि शिक्षा से मेरा अभिप्राय उस प्रक्रिया से है जो बालक एवं मनुष्य के शरीर, मन एवं आत्मा के सर्वोत्कृष्ट रूपों को प्रस्तुत करे । इस प्रकार की शिक्षा ही एक संतुलित व्यक्तित्व का निर्माण कर पाएगी ।
हमारा समाज हम से ही बना है । यदि हमारा व्यक्तित्व संतुलित नहीं होगा तो समाज में स्वस्थ संतुलन की कल्पना नहीं की जा सकती । और बिना संतुलित समाज के एक संतुलित राष्ट्र की कल्पना मिथ्या प्रतीत होती है । इसलिये यह कहना उचित है कि शिक्षा राष्ट्र निर्माण का सशक्त माध्यम है ।
आज हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यक्ता है जो बौध्दिक विकास तो संभव करे ही वरन् हमारे व्यवहार में भी वांछित परिवर्तन ले आए । ये परिवर्तन एक दिन में तो संभव नहीं हैं और आसान भी नहीं हैं । कई बार माता –पिता और परिवार ये परिवर्तन लाने में असमर्थ होते हैं । ये परिवर्तन नियमित अभ्यास से ही संभव हैं । महर्षि पतन्जलि नें भी अभ्यास से ही चित्त परिवर्तन की बात कही है जिसे उन्होने भावना की संज्ञा दी है ।
यह तथ्य अब सर्वविदित और सर्वमान्य है कि योग न सिर्फ आध्यात्म की पराकाष्ठा तक पहुंचने का मार्ग है बल्कि व्यक्तित्व निर्माण के लिये उपयोगी एक अद्वितीय विज्ञान भी है ।आध्यात्म के पालन के रूप में जो आदर्श हमें बताए गए हैं उन्हें जीवन में उतारने का माध्यम योग ही है । इस दृष्टि से देखा जाए तो योग दर्शन का ज्ञान, जो महर्षि पतन्जलि कृत योग सूत्र से हमें प्राप्त हुआ है , जीवन में मूल्यों को आत्मसात करने के लिये सर्वश्रेष्ठ है । और यदि इस प्रकार की योग आधारित मूल्यपरक शिक्षा का श्री गणेश छात्र जीवन में ही हो जाए तो ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण होगा जो न केवल अपने परिवार बल्कि समाज एवं समग्र राष्ट्र के लिये अनमोल होगा।
योग ना केवल मन की अवांछित कामनाओं को नियंत्रण करने के प्रायोगिक उपाय बताता है बल्कि इन कामनाओं के कारण शारीरिक स्तर पर जो स्वास्थ्य संबंधी विकार (व्याधियां) उत्पन्न होती हैं, उनका भी उपचार करता है । हम यह भलीभांति जानते हैं कि एक स्वस्थ शरीर में ही एक स्वस्थ मन का वास होता है । अत: अब योग एक समग्र चिकित्सा के रूप स्थापित हो चुका है ।
यदि हम योग सूत्र के अष्टांग योग की विवेचना करें तो पाएंगे कि यह शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक व्यक्तित्व विकास का सशक्त माध्यम है । और इसी को तो समग्र स्वास्थ्य कहते हैं ।
महर्षि पतंजलि ने यम अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह को “सार्वभौमा महाव्रतम् “ कहा है जो देश, काल आदि की सीमाओं से परे हैं और जिनका पालन न केवल छात्र को व्यक्तिगत स्तर पर सुख और समृध्दि जैसे लाभ देगा वरन् समूचे समाज एवं राष्ट्र के लिये हितकारी होगा । यम हमें गलत या अपराध की राह पर जाने से रोकते हैं और इसलिये ये छात्र जीवन में अति आवश्यक हैं । युवा छात्र उर्जा से भरपूर होते हैं और यदि इस उर्जा को सकारात्मक दिशा दी जाए तो राष्ट्र भी सकारात्मक दिशा में प्रगति करेगा ।
नियम अर्थात् शौच, संतोष, तपस,स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान व्यक्तिगत व्यवहार को नियन्त्रित करते हैं । इस प्रकार ये न केवल नैतिक मूल्यों में वृध्दि करते हैं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी सुदृढ करते हैं | आंतरिक शौच और संतोष मानसिक शांति एवं स्थिरता प्रदान करते हैं ।इससे मनोविकार उत्पन्न नहीं होते ।साथ –साथ छात्र लक्ष्य आधारित तपस का पालन करते हुए सफलता की ओर अग्रसर होता है । ईश्वर प्रणिधान छात्र को अहंकार से दूर रखते हुए चित्त की निर्मलता बनाए रखता है ।
आसन, अष्टांग योग का तृतीय अंग है जो शरीर में स्थिरता की शक्ति तो प्रदान करता है, साथ ही जीवन के द्वन्द्वों का सामना करने की क्षमता का विकास करता है । शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की बेहतरी, रोगों की रोकथाम एवं उपचार में आसनों के लाभ अब वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा सिध्द किये जा चुके हैं ।
अगला अंग प्राणायाम वैसे तो श्वास के नियमन के लिये है पर इसका अपरोक्ष प्रभाव मन का नियंत्रण है । आज एक छात्र की सबसे बडी समस्या यह है कि उसे अपना लक्ष्य पता तो है परन्तु उस तक पहुंचने के लिये पर्याप्त मानसिक एकाग्रता की कमी है । प्राणायाम का अभ्यास इस एकाग्रता को छात्र के लिये सुलभ बनाता है । नियंत्रित मन छात्र को लक्ष्य प्राप्ति के लिये उपयुक्त मानसिक वातावरण प्रदान करता है ।
पांचवा अंग प्रत्याहार भी ज्ञानेन्द्रियों को अंतर्मुखी बनाकर एकाग्रता में वृध्दि करता है ।
धारणा और ध्यान छात्र के चित्त की एकग्रता बढाकर उन्हें मेधावी एवं योग्य बनाते हैं और उन्हें अपना शत-प्रतिशत देने के लिये प्रेरित करते हैं । साथ ही उनकी सोच भी सकारात्मक होगी । इससे उनकी आत्मबल, भावनात्मक स्थिरता एवं निर्णय लेने की क्षमता भी बेहतर होगी ।
उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि योग शिक्षा छात्र जीवन में मूल्य स्थापित करने के लिये सर्वोत्तम माध्यम है । योग व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिये वैज्ञानिक भूमि पर आधारित प्रक्रिया है जो यदि छात्र अपने जीवन में आत्मसात कर लें तो वे न केवल स्वयम् का विकास कर पाएंगे बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में भी अग्रणी होंगे ।
ऐसा नहीं है कि मूल्यपरक शिक्षा का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है । अब जो शोध हो रहे हैं उनसे ये पता चल रहा है कि जिन परिवारों में मूल्यों की कमी, कलह और तनाव का माहौल होता है, उनके बच्चों में कई सारी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होती हैं जैसे आयु से पहले प्रजनन संबंधी बदलाव, भावनात्मक अस्थिरता , व्यसन, निर्णय लेनेकी क्षमता में कमी आदि । ये सभी समस्याएं किसी ना किसी रूप में समाज एवं राष्ट्र को प्रभावित करती हैं ।
हमारा शरीर हमारे मन से ही प्रभावित होता है । मन और मस्तिष्क अंत:स्त्रावी ग्रन्थियों के माध्यम से शरीर के विभिन्न कार्यों को प्रभावित करते हैं ।इन अंत:स्त्रावी ग्रन्थियों में पिनीयल ग्रन्थि प्रमुख है ।यह ग्रन्थि 8 वर्ष की आयु तक क्रियाशील रहती है । उसके बाद यह सिकुड्कर क्रियाहीन बन जाती है । स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कहते हैं कि यदि 8 वर्ष की आयु से बच्चों को मूल्यपरक योग शिक्षा देने की शुरुआत की जाए जिसमें शारीरिक अभ्यास जैसे आसन, प्राणायाम आदि हों और मानसिक अभ्यास जैसे यम, नियम, मन्त्र आदि का समावेश हो तो पिनीयल ग्रन्थि का क्षय कुछ हद तक रोका जा सकता है । और इसका सकारात्मक प्रभाव छात्र के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर अवश्य ही होगा ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि योग का वर्तमान शिक्षण प्रणाली की मुख्य धारा में शामिल होना कितना आवश्यक है । वर्तमान समय में देश-विदेश में किये जा रहे शोध भी योग शिक्षा की आवश्यकता एवं प्रासंगिकता को सिध्द कर रहे हैं । अत: विद्यालयीन एवं महाविद्यालयीन स्तर पर योग के विभिन्न अंगों और अभ्यासों का समावेश होना चाहिए । किस स्तर पर किस प्रकार के अभ्यास करा सकते हैं , यह विभिन्न अनुसन्धानों के निष्कर्षों की समीक्षा के बाद निश्चित किया जाना चाहिए। यदि सुनियोजित तरीके से योग का शिक्षा में समावेश किया गया तो निश्चित ही छात्रों में मूल्यों का विकास होगा और ऐसे छात्र ही राष्ट्र निर्माण की धुरी बन पाएंगे जो इस समय की परम आवश्यक्ता है ।
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Writer : Dr. Jyoti Keswani
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