How to Prevent Backache:
कमरदरद, पीठदरद हमारी आधुनिक जीवनशैली की देन हैं। बहुत शोध अध्ययनों के बाद यह बात सामने आई है कि हर व्यक्ति को अपने जीवन के दौरान कभी-न-कभी पीठदरद होता है, जिससे वह पीड़ित व व्यथित रहता है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं में कमरदरद अधिक होता है।
ज्यादातर चिकित्सकों की भी यही सलाह है कि इस दरद से बचाव के लिए जरूरी सावधानियाँ अपनाना ही इसका सबसे अच्छा इलाज है। हमारे देश में 75-80 प्रतिशत लोग इस दरद से पीड़ित होते हैं, लेकिन इसे साधारण समझकर इसके इलाज के लिए किसी चिकित्सक का सहारा नहीं लेते, बल्कि स्वयं ही इसका इलाज करते रहते हैं और तब तक कमरदरद व पीठदरद स्थायी रूप से शरीर में अपना स्थान बना लेते हैं।
आमतौर से 40 वर्ष की उम्र के बाद हमारी रीढ़ की हड्डियों का क्षरण शुरू हो जाता है। हड्डियों में कैल्सियम और अन्य खनिज पदार्थों की कमी से मांसपेशियाँ कमजोर होने लगती हैं। इस दौरान हमारी रीढ़ की हड्डी किसी भी तरह के चोट, दबाव व किसी भी प्रकार के विकार के कारण प्रभावित होने लगती है और उसमें तकलीफ बढ़ जाती है। जो लोग स्लिप डिस्क (स्लिप डिस्क किसी भारी चीज को उठाने, खेल या किसी क्रिया के दौरान शरीर के गलत ढंग से खिंचने या किसी प्रकार के अचानक दबाव के कारण होती है) के शिकार होते हैं, उन्हें पीठदरद होना आम बात है। इसके अलावा पोषक तत्त्वों की कमी, लंबी बीमारी आदि कारणों से भी पीठ में दरद रहने लगता है।
वास्तव में पीठ में दरद की वजह रीढ़ की हड्डी व उससे जुड़ी मांसपेशियाँ हैं, जिनमें गलत ढंग से बैठने, खड़े होने और लेटने के समय आवश्यकता से अधिक दबाव पड़ने से दरद होने लगता है। प्रायः बच्चे पेट के बल लेटकर पढ़ाई करते हैं या टीवी देखते हैं। जब वे स्कूल में बैंच पर बैठकर काम करते हैं, तो अपनी गरदन, सिर व कमर को आगे की तरफ झुका लेते हैं |
इस मुद्रा में बैठकर काम करने से पीठदरद की संभावनाएँ काफी बढ़ जाती हैं। सच तो यह है कि अपनी दिनचर्या में हम जो भी कार्य करते हैं, उन सभी कार्यों में हमारी पीठ पर दबाव पड़ता है, जब तक हमारी रीढ़ की हड्डी स्वस्थ रहती है, तब तक हमें यह दबाव महसूस नहीं होता, लेकिन जैसे ही वहाँ कोई दिक्कत होती है, पीठ का दरद उभरकर सामने आ जाता है
पीठदरद के कारणों का पता लगाने के लिए हमें अपनी रीढ़ की हड्डी की बनावट को समझना होगा। हमारी रीढ़ की हड्डी 33 हड्डियों को एक के ऊपर एक रखकर मिलने से बनी है। प्रत्येक हड्डी के बीच में एक डिस्क होती है। हमारे शरीर के ऊपरी हिस्से का पूरा वजन रीढ़ की हड्डी को ही सहना पड़ता है और आवश्यकता से अधिक कार्य करने व दबाव पड़ने पर पीठदरद होने लगता है।
भले ही व्यक्ति का शरीर बहुत मजबूत क्यों न हो, यदि वह जरूरत से ज्यादा मेहनत करता है तो उसकी रीढ़ की हड्डी प्रभावित हुए बिना न रहेगी। थके होने पर भी लगातार कार्य करते रहना पीठदरद को बुलावा देना है। गलत तरीके से व्यायाम करना भी पीठदरद का एक कारण हो सकता है। कुरसी पर घंटों बैठे रहकर काम करना, कंप्यूटर वर्क करना भी पीठदरद को निमंत्रण दे सकता है। उम्र बढ़ने के साथ- साथ शरीर का भी क्षय होने लगता है और रीढ़ की हड्डी को होने वाला नुकसान इस बात पर निर्भर करता है कि युवावस्था में उस पर कितना दबाव पड़ा था।
हमारे शरीर में पोषक तत्त्वों की कमी के कारण भी रक्त-संचालन की प्रक्रिया में गड़बड़ी होती है, जिसके कारण रीढ़ की मांसपेशियों पर अधिक दबाव पड़ता है, जिससे पीठदरद होता है। अधिक भाग-दौड़ व परिश्रम करने वाले लोग जो काम करने के साथ-साथ आराम नहीं करते, वे भी पीठदरद से पीड़ित होते हैं। ज्यादा मोटे लोग भी प्रायः पीठदरद से परेशान रहते हैं। ऐसे लोग जो अक्सर कोमल, नरम बिस्तर पर शयन करते हैं, वो भी पीठदरद की चपेट में आ जाते हैं; क्योंकि नरम बिस्तर पर लेटने के कारण मांसपेशियाँ आराम करने लगती हैं और हड्डियों को सहारा न मिलने के कारण पीठ में दरद होने लगता है।
ऊँची एड़ी के जूते, चप्पल व सैंडिल भी पीठदरद का कारण हो सकते हैं; क्योंकि इन्हें पहनकर चलने से शरीर का जो स्वरूप होता है, वह आरामदायक नहीं होता है और इस स्वरूप में लंबी दूरी तय करना शरीर के लिए कष्टदायक होता है। ऊँची एड़ी के जूते से ज्यादा तेज चलने पर संतुलन बिगड़ने के कारण पैर मुड़ जाता है और इसका सीधा असर रीढ़ की हड्डी पर पड़ता है और इससे पीठदरद या कमरदरद शुरू होता है।
आहार के नियमों के विपरीत भोजन करने वाले लोगों को भी अक्सर पीठदरद की शिकायत रहती है। भोजन न पचने, कब्ज रहने आदि से जो गैस बनती है उसके कारण भी पीठदरद व कमरदरद होता है। गलत मुद्रा में बैठना भी पीठदरद का कारण होता है, इसलिए हमेशा आरामदेह स्थिति में बैठना चाहिए और इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बैठते समय शरीर में झुकाव व तनाव न हो।
जिन्हें पीठदरद की शिकायत रहती है, उन्हें जमीन से कोई भी वस्तु उठाते समय अपनी पीठ को न झुकाकर हमेशा घुटनों को मोड़कर ही वस्तु को उठाना चाहिए। ऊँचाई रखी हुई वस्तु को उतारने के लिए उचकने के बजाय स्टूल आदि का प्रयोग करना चाहिए। हमेशा सीधे बैठकर ही भोजन करना चाहिए, न कि कमर को आगे झुकाकर । कभी लगातार खड़े रहना हो तो हमेशा पाँव की स्थिति बदलते हुए खड़े रहना चाहिए, हमेशा मुलायम व आरामदेह जूते, चप्पल व सैंडिल पहनने चाहिए। रात में गहरी नींद में सोना चाहिए; क्योंकि गहरी नींद में सोने से मांसपेशियों को बल मिलता है। रात में सोते समय भी बीच-बीच में करवट बदलते रहना चाहिए, सोने के लिए, ज्यादा ऊँचे तकिए का प्रयोग भी नहीं करना चाहिए। अपनी दिनचर्या में हमें ऐसे सभी कार्यों को करने से बचना चाहिए, जिनसे पीठ में दरद बढ़ जाता है |
पीठदरद से राहत पाने के लिए अपनी दिनचर्या में कुछ ऐसे व्यायाम शामिल करना चाहिए, जिनसे कमर के नीचे की मांसपेशियों में सक्रियता बढ़े। इससे मांसपेशियों में लचीलापन बना रहता है और वे मजबूत होती हैं, जिससे पीठदरद की शिकायत नहीं होती या बहुत कम होती है। शरीर के अन्य अंगों के साथ-साथ तेल से पीठ की मालिश करने से भी दरद में आराम मिलता है और शरीर की सक्रियता बढ़ती है। पोषक तत्त्वों से युक्त उचित व संतुलित खान-पान के सेवन से भी शरीर में होने वाले दरद से राहत मिलती है। इसके अतिरिक्त यदि कोई अन्य शारीरिक बीमारी है तो उसके कारण भी पीठदरद हो सकता है। ऐसे में पीठदरद से राहत पाने के लिए चिकित्सक से परामर्श लेना व उनके द्वारा बताए गए पथ्य-परहेज का पालन करना जरूरी है।
Amit Sharma
Writer
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