Collapse is necessary before new creation:
खेती करने का मुख्य उद्देश्य फसल उगाना है। किसान कृषिकार्य में जुटता है तो उसकी अंतिम परिणति के रूप में उगे हुए अनाज को देखकर अपने परिश्रम पर संतोष, तृप्ति, तुष्टि अनुभव करता है. अनाज पैदा करना, फसल उगाना-ये कार्य दिखने में पूर्णतया सृजनात्मक लगते हैं और इनका परिणाम 'भी सृजनात्मक ही होता है, परंतु तब भी इनकी शुरुआत जिस तरह से की जाती है, वह देखकर किसी को ऐसा भ्रम सहजता से हो सकता है कि यहाँ कोई ध्वंस का कार्य किया जा रहा है. पहले कुदाल से लेकर या ट्रैक्टर-फावड़े से जमीन जोती जाती है और फिर दबे हुए कंकड़-पत्थर, मरे-पौधे इत्यादि निकाल-निकाल कर फेंके जाते हैं. उस दौरान कोई खेत का अवलोकन करे तो उसे यह भ्रम हो सकता है कि इस स्थान पर कोई दुष्कर कर्म संपन्न किया जा रहा है।
जिसने कभी खेती न की हो या कृषिकार्य में अपना हाथ न लगाया हो, उसे ऐसा भ्रम होना स्वाभाविक है, परंतु किसान को यह पता होता है कि वह उस भूमि में क्या करने जा रहा है. दूरदर्शियों को वर्तमान में घटती विषमताओं को 'देखते हुए भी यह भान हो जाता है कि इन परिस्थितियों का अंत किस सृजनात्मक रूप में होने जा रहा है. युग-परिवर्तन की इस वेला में भी कुछ ऐसा ही घट रहा है. संधिकाल के दिनों से यह मानवता आज गुज़र रही है और इसीलिए सर्वत्र कष्ट-कठिनाइयों की घटाएँ उमड़ती-घुमड़ती दिखाई पड़ती हैं. प्रकृति कुपित, वातावरण प्रदूषित, चिंतन विकृत एवं भावनाएँ दूषित नजर आती हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि मानो यह अंधकार भरा युग शायद कभी समाप्त ही न हो. अंतर्मन के में घुटन-सी महसूस होती है और कहीं भाग निकलने का मार्ग भी नजर नहीं आता. हर क्षेत्र में इसी तरह के विग्रह अपना एकछत्र राज्य स्थापित करते दिखाई पड़ते हैं।
इन विपरीत परिस्थितियों को देखकर अनेकों के मन में असुरक्षा, अनिश्चितता एवं आशंका के प्रश्न उभरते हैं कि यह कैसा नवसृजन है कि जिसमें मात्र विपदाओं की ही बाढ़-सी आ गई है? लोग सोचते हैं कि सृजन में भगवान को सुख-सुविधाओं की वर्षा करनी चाहिए थी, अनुग्रह-आशीर्वाद देना चाहिए था, फिर ये विपत्तियों का मंजर क्यों ? यदि इन प्रश्नों का उत्तर पाना हो तो हमें विधाता की योजना को एक कृषक के कार्य से तौलकर देखना होगा. जैसे-भूमि को उर्वर बनाने से पहले उसकी खरपतवार को उखाड़ फेंका जाता है, उस भूमि को जोता जाता है, हल-कुदाल-फावड़ों जैसे यंत्रों-उपकरणों का प्रहार उस पर किया जाता है, वैसे ही नवसृजन के लिए उपयुक्त परिस्थितियों के निर्माण से पहले लोगों की मनोभूमि की निर्माण-प्रक्रिया भी आवश्यक हो जाती है।
यही प्रक्रिया भवन-इमारतों को बनाने में इस्तेमाल होती है. जितनी ऊँची इमारत बनानी हो, उतनी ही गहरी नींव खोदी जाती है. यदि गहरी नींव न खोदी जाए तो इमारत का वजन बढ़ते ही जमीन दरकने लगेगी, दीवार फटने लगेगी और उठा हुआ ढाँचा ध्वस्त होते देर नहीं लगेगी। इन दिनों महाकाल भी नवनिर्माण का भवन बनाने में लगे हैं और उसी की मजबूती को ध्यान में रखते हुए, इन दिनों नींव रखने जैसा उपक्रम किया जा रहा है. इसीलिए नवनिर्माण की इन घड़ियों में विनाशलीलाओं का प्रभुत्व देखने को मिलता है. अंधकार से भरा युग विगत हजार वर्षों से चला आ रहा है. इन दिनों में बहुत-सी गंदगी व कचरा इकट्ठा हो गया है. यदि उसे यों ही छोड़कर सृजन के कार्य में लगें तो आज नहीं तो कल, उसके दुष्परिणाम हमें ही भुगतने पड़ेंगे, इसलिए उलटा दिखते हुए भी वर्तमान का पथ, भविष्य के कष्टों से निवारण के लिए श्रेष्ठतम विकल्प है।
इसमें किसी को शंका नहीं करनी चाहिए कि सहस्राब्दियों से चली आ रही अंधतमिस्रा का अब अंत होने जा रहा है, परंतु सौंदर्य के प्राकट्य से पहले गंदगी का निराकरण जरूरी है. विपत्तियों की आँधी को रोके बिना स्थिरता का वातावरण उत्पन्न कर पाना संभव नहीं है. वर्तमान परिस्थितियों को ऐसे ही परिप्रेक्ष्य में देखने-सुनने- समझने की आवश्यकता है. बिना ध्वंस करे, सृजन के वातावरण को विनिर्मित कर पाना संभव नहीं है।
Amit Sharma
Writer