* युद्ध से हथियारों की खरीद में इजाफा *war improve purchasing order of weapon

युद्ध का असर 

           मिडिल ईस्ट में युद्ध से दुनिया में हथियारों की बिक्री में भी इजाफा। हथियार खरीदने की डील 183 लाख करोड़ हुई, अगले साल 23% और बढ़ेगी यह नया रिकॉर्ड होगा । 
              हमास के साथ इजराइल का संघर्ष। यूक्रेन पर रूस का आक्रमण और चीन के उदय ने हथियार निर्माता के लिए तेजी ला दी है । युद्ध के चलते अमेरिका को अन्य देशों के साथ घनिष्ठ सैन्य संबंध बनाने का मौका मिला है । अमेरिकी हथियारों की खेप इजराइल में पहुंचनी शुरू हो गई है । स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ( सिपरी ) के अनुसार ,पिछले साल दुनिया भर में सैन्य खर्च हथियारों ,कर्मियों और अन्य लागतो पर 2.2 ट्रिलियन डॉलर (  करीब 183 लाख करोड़  रुपए ) तक पहुंच गया,  जो शीत युद्ध खत्म होने के बाद उच्चतम स्तर पर है। 
              सैन्य खर्च पर नजर रखने वाली कंपनी जेन्स के मुताबिक अमेरिका ,चीन और रूस में बिक्री को छोड़कर सैन्य खरीद पर वैश्विक खर्च अगले साल 241 अरब डॉलर (20 लाख करोड़ रुपए  ) तक पहुंचने की उम्मीद है । यह पिछले साल से 23% ज्यादा होगा ।  यह अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि होगी ।  पिछले साल तक दुनिया में बिके हथियारों में से 45% हिस्सा अमेरिका का था।  यह किसी अन्य देशों की तुलना में पाँच गुणा है । 
         ( अमेरिका से हथियारों की सप्लाई में देर, दक्षिण कोरिया जैसे दूसरे देशों के लिए बड़ा मौका। ) 
          सेना मारक क्षमता बढ़ाने के चलते हथियारों की मांग में तेजी आने से तुर्की और दक्षिण कोरिया जैसे हथियार उत्पादक देश को भी निर्यात बढ़ाने का मौका मिला है ।  इस कारण खरीदारों को ऐसे समय और अधिक विकल्प मिले हैं ,जब अमेरिका से सप्लाई में देरी हो रही है । कुछ बड़े खरीदार जैसे नाटो सहयोगी पोलैंड, रूसी आक्रामकता  का मुकाबला करने की तैयारी कर रहा है । वह खुद को और अधिक हथियारों से लैस कर रहा है । इसी तरह इंडोनेशिया, जो कभी रूस का ग्राहक था ,अब पश्चिम से अधिक हथियार खरीदने की ओर बढ़ रहा है।  मध्य पूर्व के देश इजराइल से लेकर सऊदी अरब तक अमेरिकी हथियारों के प्रमुख खरीदार है । इनके ऑर्डर अब नए युद्ध के साथ फिर से बढ़ेंगे । हथियार खरीदी में बढ़ोतरी, यूरोप और मध्य पूर्व में युद्ध से संघर्ष घातक होने की आशंका बड़ी है ।  
         

Rapid increase in arms purchases